दिन भर के अभिनय के बाद
अलग अलग मुखौटों को उतार
नींद की प्रतीक्षा में
सुनाई दे रहा है
रात का सन्नाटा, सांस का शोर
नितांत एकांत में बढ़ गई है व्याकुलता
यादों ने खोल दी है
आँसू की अविरल धारा !
आँसू वही हैं!
दुःख के, सुख के
आँसू नहीं बदलते
भाव बदलता है !
खुशी के आँसू
रूक जाते हैं अपने आप,
दुःख के आँसू
रोकने के लिए
देना पड़ता है खुद को दिलासा,
पर ये जो शोक के आँसू है
इन्हें कैसे रोका जाए
क्या दें दिलासा
जाने वाले लौट के तो नहीं आएँगे !
धीरे धीरे सीख रहा हूँ
शोक के आँसू रोके नहीं जा सकते
हाँ इन्हें सोख सकती है,
बस एक चीज -
जिजीविषा !!
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