मैं दरिया हूँ ...
निर्भर करता है तुम पर...
तुम मुझमे क्या देखो...
उछ्रिंखल लहरों का नृत्य,
कल कल बहती धारा देखो और भर जाओ मस्ती से , आतुर हो के मेरे लिए...
या मेरी मंथर गहन मौन बेबस सी बहती धारा देख उदासी से भर जाओ....
पर मैं तो बहता रहूँगा स्वछन्द या फिर कह लो बेबस...
गर तुम मेरे लहरों के संग ताल बिठा लो...
मेरे बेरंग पानी में कुछ रंग जमा लो...
गर तैर सको मेरी बाँहों में स्वागत है तेरा....
पर आकर्षण भर से कूदोगे मुझमे तो डूब जाओगे....!
~प्रवीण~
निर्भर करता है तुम पर...तुम मुझमे क्या देखो...
उछ्रिंखल लहरों का नृत्य,
कल कल बहती धारा देखो और भर जाओ मस्ती से , आतुर हो के मेरे लिए...
या मेरी मंथर गहन मौन बेबस सी बहती धारा देख उदासी से भर जाओ....
पर मैं तो बहता रहूँगा स्वछन्द या फिर कह लो बेबस...
गर तुम मेरे लहरों के संग ताल बिठा लो...
मेरे बेरंग पानी में कुछ रंग जमा लो...
गर तैर सको मेरी बाँहों में स्वागत है तेरा....
पर आकर्षण भर से कूदोगे मुझमे तो डूब जाओगे....!
~प्रवीण~