शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
क्षणभंगुर मन
गर्म तवे के जैसा ये मन ,
खुशियों की कुछ बूंदें पाकर;
क्षण से छनका ,
फिर गुम क्यों है ??????
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011
अंतर्द्वंद
मै जाता हूँ ,पाषाणों से सर टकरा कर फिर आता हूँ ...!!!!
जाता हूँ गर्वोन्नत होकर ,
उतशाहित ,उद्वेलित होकर,
करता हूँ जब भीषण गर्जन ,
पाषाणों की तब क्या बिसात ,
यम भी एक बार थर्राता है ......
मै जाता हूँ ,पाषाणों से सर टकरा कर फिर आता हूँ ....!!!!
पर लौट के जब मैं आता .हूँ ,
मंथर सी अपनी चाल लिए ,
अपमानित सा , बैचैन सा ;
हर लहरों का परिहास लिए ,
चट्टानों का वो अट्टहास ;
अपने सपनों का हस्र देख ;
मैं हतप्रभ सा रह जाता हूँ !!!!
......................क्रमशः .
अपमानित सा , बैचैन सा ;
हर लहरों का परिहास लिए ,
चट्टानों का वो अट्टहास ;
अपने सपनों का हस्र देख ;
मैं हतप्रभ सा रह जाता हूँ !!!!
......................क्रमशः .
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)

