सोमवार, 10 सितंबर 2012
मंगलवार, 21 अगस्त 2012
डगमगाते क़दमों से....
पिछले कई सालों से ,ढहती दीवारों को देखता मैं ;दबते- पिसते अरमानों को अपनी आंसुओं के संग बहता ,
अकर्मण्य की तरह शांत ,
ऊपर से हिम की चादर तले दबाता क्रोध और निराशा की ज्वालामुखी को ;
अवसाद के भाड़ से दबते व्यक्तित्व को संभाले ,
डगमगाते क़दमों से
स्याह पथ पर अग्रसर ,
निरंकुश बेमतलब .
एक गजब के मोहपाश में बंधा ,
उन्मादित सा ,
मिथ्या और सत्य के बीच की पतली लकीर पर डोलता मैं।
सोमवार, 2 जुलाई 2012
बुधवार, 20 जून 2012
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ
है भींगी पलकें आज मेरी ,
दिल में यादों की झंझावत ,
मैं मर्माहत बैचैन सा ,
एक अकुलाहट को चिर कर ,
बरबस ये आवाज आई ,
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ ;;
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ ;;है मोम की मोटी चादर सी
जमी हुई मेरे मन में ,
तुम अपने स्नेह की गर्मी से
पिघला जाओ ,बस आ जाओ
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ ;;
उस सुन्दर निर्मल वेला में,
जब साथ चले थे हम दोनों ..
फिर दिन के निष्ठुर धुप में यूँ ,
तुम चले गये तनहा करके ..
अब अवसान की वेला है,
एक छाँव लिए बस आ जाओ ..
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ ;;
इस तिक्रम्बाज़ी दुनिया में ,
मैं थककर चकनाचूर हुआ ..
चलते चलते न मिली मंजिल ,
अब सुस्ताने को अंकुश में ,बस आ जाओ....
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ ;;
मैं तेरे आगे नतमस्तक,
सर झुका के गलती मान रहा ..
मेरे मरु भूमि जीवन में ,
तुम प्यार की बारिश करने को ,
बस आ जाओ...
तुम आ जाओ ,बस आ जाओ ;;
सोमवार, 11 जून 2012
मंगलवार, 24 अप्रैल 2012
ये सपने अच्छे लगते हैं
कुछ धुंधले- धुंधले लगते हैं ..
कुछ झल्फल-झल्फल दीखते हैं;
कुछ मीठे -खट्टे लगते हैं ,
कुछ कडवे- फीके लगते हैं;
कुछ अपने-गैर से लगते हैं;
कुछ बनते - बनते दीखते हैं ,
कुछ टूटे- फूटे लगते हैं;
कुछ झल्फल-झल्फल दीखते हैं;
कुछ मीठे -खट्टे लगते हैं ,
कुछ कडवे- फीके लगते हैं;
कुछ अपने-गैर से लगते हैं;
कुछ बनते - बनते दीखते हैं ,
कुछ टूटे- फूटे लगते हैं;
ये सपने अच्छे लगते हैं......
गुरुवार, 29 मार्च 2012
अतीत के बंधन
हम अतीत के बंधन से यूँ ,
उबर नहीं क्यों पाते हैं ;
छूटे कूल किनारों पर ही ,
लौट के क्यों हम आते हैं .!!!!
उबर नहीं क्यों पाते हैं ;
छूटे कूल किनारों पर ही ,
लौट के क्यों हम आते हैं .!!!!
शनिवार, 28 जनवरी 2012
Kuchh Yunhi
पतझड़ के इस मौसम में
ये बसंत कहा से आया है ..!!!
काँटों से छलनी है ये दिल
पर जाने क्यों मुस्काया है....!!!
ये बसंत कहा से आया है ..!!!
काँटों से छलनी है ये दिल
पर जाने क्यों मुस्काया है....!!!
बुधवार, 25 जनवरी 2012
अनसुलझे प्रश्न
या,पुराने घर छोड़ने का गम ;
आँखों से बहते अश्र ,
कोई कह नहीं सकता हैं ये
ख़ुशी के या गम के;
कल-कल बहती नदी ;
कल-कल बहती नदी ;
बहती है स्वछंद ;
या, है वो बहने को बेबस ;
परछाईया है सर पे ;
जाने है वो भूत के या ,
भविष्य के ;
पंछियों की चहचाहट ,
परछाईया है सर पे ;
जाने है वो भूत के या ,
भविष्य के ;
पंछियों की चहचाहट ,
है एक स्वरबध्ह गान ;
या, शिकारी के भय से तिरोहित होते अरमान ;
सांस लेते हम जीने को;
जरूरी या ,एक अभिसप्त सी मजबूरी .....!!!!
सांस लेते हम जीने को;
जरूरी या ,एक अभिसप्त सी मजबूरी .....!!!!
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