गुरुवार, 30 जनवरी 2014

गंगा कहे और हम सुनें



गंगा, पापोद्धारिणी गंगा     !
निकली थी जब शिव की जटा से 
इठलाती बलखाती गंगा ,
अपने निर्मल अमृत जल से 
धरा की प्यास बुझाने गंगा ,
गंगोत्री के गर्भ से निकली 
हिमालय की गोद से उतरी 
शुद्ध और सुवासित गंगा,
सदियों से भारत भूमि को 
उपकृत करती आयी गंगा  ...!!

लेकिन आज  प्रदूषण  से
सिसक रही अपनी गंगा ,
सुख गया है आँचल उसका 
कचड़े को ढोती  गंगा ,
शहरीकरण के दौड़ में 
कही कुचल गयी अपनी गंगा ….!!

तो आओ मिल के प्रण करें
गंगा का जीवन चुनें,
अपने छद्म स्वार्थों को छोड़
गंगा कहें और हम सुनें !!