उन्मुक्त उड़ान | Unmukt Udaan
सोमवार, 7 जुलाई 2014
राहों को छोड़, ली है मैंने पगडण्डी
राहें जो तुमने बतलायी थी
जाती है सफलता की ओर
उन राहों को छोड़,
ली है मैंने पगडण्डी ।
क्यूंकि भीड़ बहुत है राहों पर
और डर है खुद को खोने का
इसलिए पगडण्डी चुनी है
गिरता-संभलता-लड़खड़ाता
कम से कम मैं तो हूँ
इस पर अपने साथ।
~प्रवीण~
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