पिछले कई सालों से ,ढहती दीवारों को देखता मैं ;दबते- पिसते अरमानों को अपनी आंसुओं के संग बहता ,
अकर्मण्य की तरह शांत ,
ऊपर से हिम की चादर तले दबाता क्रोध और निराशा की ज्वालामुखी को ;
अवसाद के भाड़ से दबते व्यक्तित्व को संभाले ,
डगमगाते क़दमों से
स्याह पथ पर अग्रसर ,
निरंकुश बेमतलब .
एक गजब के मोहपाश में बंधा ,
उन्मादित सा ,
मिथ्या और सत्य के बीच की पतली लकीर पर डोलता मैं।