एक नयी सुबह की चाह ..

एक नयी सुबह की चाह लिये 
वो रात अँधेरी गुजर गया 
वो चाँद को छूने की ख्वाहिश 
उस चाँद के सम्मुख दफ़न हुयी..!!!!

रक्तिम सा रूप सलोना सा
वो दिवस की भट्टी में तपकर
सर्वस्व विजय की चाह लिए
वो राह अनोखे निकल गया...!!!!

पर दूर तलक जाकर देखा
तो रात अँधेरी काली थी
कुछ देर खड़ा वो मौन रहा
कुछ झुंझलाया कुछ भ्रमित सा
फिर ख्वाब सुबह का लीये हुए
अपने ही धुन में मतवाला
वो राह उसी बढ़ता ही गया

एक नयी सुबह की लिए .....................