दौर ए गम से बच के निकल जाउंगा,
मैं किसी बच्चे की तरह बेखौफ मुस्कुराऊंगा।
काँपते हाथ को जो तुम ना संभाले अगर,
याद रखना कि फिर हाथ नहीं आऊंगा।
सूरज सी फितरत थी चमकने की मेरी,
अब तो लगता है कि मैं भी बदल जाऊंगा।
अपने आँसू को जमा रहा हूं मैं,
कभी बादल की तरह बरस जाऊंगा।
और मुझे जानने का भरम पाले बैठे हो
खुद को मेरा खुदा मान बैठे हो
तो बता दूँ कि, मैने यूँ तो कभी नहीं बताया है
पर तुम जैसे कइयों को मैंने, हाँ मैंने, बनाया है ।।
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