बुधवार, 13 जुलाई 2016

पंख !!

वो रोज एक बोझ लिये उठता
एक अहसास भारीपन का लिये
चलता  रहता दिन भर
कभी कभी तो नींद में भी
उस बोझ को ढ़ो रहा होता था।

कई बार जब मिलता  मुझसे
बोझ उठाये हुये तो कहता, 
दोस्त ! हो सके तो सम्भाल लो
इस बोझ को कुछ देर के लिये
ताकि उड़ सकूँ थोड़ा सा मैं भी 
औरों की तरह 
रोज मना कर देता मैं। 
कहता था हल्का ही सही,
एक बोझ तो मेरे उपर भी है

फिर ढूंढता था उसके संग
कोई ऐसा जिसे कोई बोझ ना हो
कोई ऐसा नहीं मिलता
जिसपर कोई बोझ ना हो
हर एक शख्स थोड़ा झुका सा दिखता

कई दिनों तक दोस्त दिखा नहीं
तो पहुँच गया मैं उससे मिलने
देखा तो वो उड़ रहा था
मैं हैरान हो गया
उड़ते उड़ते उसने बताया
दोस्त वो जो बोझ था ,

दरअसल वो पंख था !!