सोमवार, 7 जुलाई 2014

राहों को छोड़, ली है मैंने पगडण्डी

राहें जो तुमने बतलायी थी

जाती है सफलता की ओर
उन राहों को छोड़,
ली है मैंने पगडण्डी ।
क्यूंकि भीड़ बहुत है राहों पर
और डर है खुद को खोने का
इसलिए पगडण्डी चुनी है
गिरता-संभलता-लड़खड़ाता
कम से कम मैं तो हूँ
इस पर अपने साथ।
~प्रवीण~

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

मोह

कबाड़ी वाले के ठेले पर थी
एक चादर की गठरी
चादर में लिपटी थी कुछ चीजें
वो चीजें जो खास थी कभी
वो चीजें जिनसे आत्मीय लगाव था
एक मोह था जिनसे ,
वो चीजें जिन्हे पाने में बहे थे
ना जाने कितनी पसीने की बूँदें
और जले थे जाने कितने खून के कतरे
लेकिन अब वो कबाड़ी थे
उनकी जगह ले ली थी नयी चीजों ने
अब मोह उन से था !

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

गंगा कहे और हम सुनें



गंगा, पापोद्धारिणी गंगा     !
निकली थी जब शिव की जटा से 
इठलाती बलखाती गंगा ,
अपने निर्मल अमृत जल से 
धरा की प्यास बुझाने गंगा ,
गंगोत्री के गर्भ से निकली 
हिमालय की गोद से उतरी 
शुद्ध और सुवासित गंगा,
सदियों से भारत भूमि को 
उपकृत करती आयी गंगा  ...!!

लेकिन आज  प्रदूषण  से
सिसक रही अपनी गंगा ,
सुख गया है आँचल उसका 
कचड़े को ढोती  गंगा ,
शहरीकरण के दौड़ में 
कही कुचल गयी अपनी गंगा ….!!

तो आओ मिल के प्रण करें
गंगा का जीवन चुनें,
अपने छद्म स्वार्थों को छोड़
गंगा कहें और हम सुनें !!