चलते राहों पर कितने पत्थर - कितने फूल बिछे थे अब तक,
कितनी ठोकर - कितना स्नेह मिला है अब तक;
इन बातों का लेखा जोखा करने का है ये वक़्त नहीं,
एक मोड़ नजर आ रही सामने हो जाओ तैयार अभी।
माना पथ पर तुम गिरे पड़े
कुछ चोट अभी हैं हरे भरे
माना अब तक तुम हार रहे
कुछ नियति के हैं मार पड़े
किन्तु ये अंत नही है
ये हार अनंत नही है
अँधेरे की खाई भली गहरी
पर उजियारा दूर नही है
है वक़्त की लोलक चाल यही
उत्तुंग शिखर को छूकर ये
फिर वापस नीचे आता है
अवनति की निचले तल छूकर
ये पुनः शिखर को जाता है
