रविवार, 21 जुलाई 2013

एक मोड़ नजर आ रही सामने हो जाओ तैयार अभी


चलते राहों पर कितने पत्थर - कितने फूल बिछे थे अब तक,
कितनी ठोकर - कितना स्नेह मिला है अब तक;
इन बातों का लेखा जोखा करने का  है ये वक़्त नहीं,
एक मोड़ नजर आ रही सामने हो जाओ तैयार अभी।


माना पथ पर तुम गिरे पड़े
कुछ चोट अभी हैं हरे भरे
माना अब तक तुम  हार रहे
कुछ नियति के हैं मार पड़े

किन्तु ये अंत नही है
ये हार अनंत नही है
अँधेरे की खाई भली गहरी
पर उजियारा दूर नही है

है वक़्त की लोलक चाल यही
उत्तुंग शिखर को छूकर ये
फिर  वापस नीचे आता है
अवनति की निचले  तल छूकर
ये पुनः शिखर को जाता है







बुधवार, 3 जुलाई 2013

खोल दो इन बंधनों को



खोल दो इन बंधनों को,
उड़ने दो उन्मुक्त;

बाँधा जो तुमने था कभी

एक अबोध शिशु के मानस पर

रिश्तों का ककहरा सिखा कर,
पत्थर के आगे घुटने टिकवाकर;
थोप दी कूड़ा की वो पट्टियां

हटा दो इन पट्टियों को

हो जाने दो फिर से निर्दोष ....!!!