पिघलता पर्वत


स्याह  काली  चादर  सी   फैली  हुइ  रात  में  शरद  हवा  के  थापेरों  ने  एक    बिभत्श   सी  स्थिति  उत्पन्न  कर  दी  है .....घबराये  हुए  श्वानो  ने  भी  भोंकना  कम  कर  दिया  है  ....निह्सब्द्ता  के  दीवार  को  चीरती  हुए  उल्लुओं  की  आवाज  भी  रुक  रुक  कर  आ  रही  है  .....

दूर  कही  से  आती  हुई   घरियाल  की  आवाज  सुने  गलियों  के  दीवारों  से  टकराकर  कम्पायमान  हो  रही  है ....अलसाई  रात  ने  अपने  निद्राजाल  को  चहुओर  फैला  सा  दिया  है ....किन्तु  न  जाने  क्यों  बड़ी  हवेली  से  टकरा  कर  आ  रही  हवाएं  कुछ  ज्यादा  ही  शुष्क   हो  रही  हैं ...


रवटें बदलते ही आँसुओं की दिशा बदल जा रही है .....अचानक दिए की रौशनी में आयने में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर चौंक सी उठी वो .......सन  सी सफ़ेद बालों के बीच में सुनी मांग को देखकर जैसे कही खो सी गयी वो ...हाथों की झुरियों के बीच सुनी कलाई बिलकुल ऐसी लग 



रही जैसे उसके सम्पूर्ण जीवन का सूनापन प्रतीकित कर रही हो ............(क्रमशः)