मै जाता हूँ ,पाषाणों से सर टकरा कर फिर आता हूँ ...!!!!
जाता हूँ गर्वोन्नत होकर ,
उतशाहित ,उद्वेलित होकर,
करता हूँ जब भीषण गर्जन ,
पाषाणों की तब क्या बिसात ,
यम भी एक बार थर्राता है ......
मै जाता हूँ ,पाषाणों से सर टकरा कर फिर आता हूँ ....!!!!
पर लौट के जब मैं आता .हूँ ,
मंथर सी अपनी चाल लिए ,
अपमानित सा , बैचैन सा ;
हर लहरों का परिहास लिए ,
चट्टानों का वो अट्टहास ;
अपने सपनों का हस्र देख ;
मैं हतप्रभ सा रह जाता हूँ !!!!
......................क्रमशः .
अपमानित सा , बैचैन सा ;
हर लहरों का परिहास लिए ,
चट्टानों का वो अट्टहास ;
अपने सपनों का हस्र देख ;
मैं हतप्रभ सा रह जाता हूँ !!!!
......................क्रमशः .

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें