मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

अंतर्द्वंद

मै जाता हूँ ,पाषाणों से सर टकरा कर फिर आता हूँ ...!!!!
जाता हूँ गर्वोन्नत होकर ,
उतशाहित ,उद्वेलित होकर,
करता हूँ  जब भीषण गर्जन ,
पाषाणों की तब क्या बिसात ,
यम भी एक बार थर्राता है ......
मै जाता हूँ ,पाषाणों से सर टकरा कर फिर आता हूँ ....!!!!











पर लौट के जब मैं  आता .हूँ ,
मंथर सी अपनी चाल  लिए ,
अपमानित सा , बैचैन सा  ;
हर लहरों का परिहास लिए ,
चट्टानों का वो अट्टहास ;
अपने  सपनों का हस्र देख ;
मैं हतप्रभ सा रह जाता हूँ  !!!!


......................क्रमशः .   

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