वो रोज एक बोझ
लिये उठता ।
एक अहसास भारीपन का
लिये
चलता रहता दिन
भर ।
कभी कभी तो
नींद में भी
उस बोझ को
ढ़ो रहा होता
था।
बोझ उठाये हुये तो
कहता,
दोस्त ! हो सके
तो सम्भाल लो
इस बोझ को
कुछ देर के
लिये
ताकि उड़ सकूँ
थोड़ा सा मैं
भी
औरों की तरह ।
रोज मना कर देता मैं।
कहता था
हल्का
ही सही,
एक बोझ तो
मेरे उपर भी
है ।
फिर ढूंढता था
उसके संग
कोई ऐसा जिसे
कोई बोझ ना
हो ।
कोई ऐसा नहीं
मिलता
जिसपर कोई बोझ
ना हो ।
हर एक शख्स
थोड़ा झुका सा
दिखता ।
कई दिनों तक दोस्त
दिखा नहीं ।
तो पहुँच गया मैं
उससे मिलने
देखा तो वो
उड़ रहा था
।
मैं हैरान हो गया
।
उड़ते उड़ते उसने बताया
दोस्त वो जो
बोझ था न,
दरअसल वो पंख था
!!

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें