बुधवार, 8 अप्रैल 2015

जब सोता है शहर !

जब सोता है शहर !
बालकनी में होता है खड़ा कोई,
देख रहा दूर गली में
हलकी सी आहट पर 
अलसायी आँखों से देखते कुत्ते को,
लैम्पपोस्ट की रौशनी में
नाचते पतंगे को,
चुपचाप लेटे हुए
थके हारे गली को,
दिन भर अलग अलग रस्ते पर चलकर लौटी,
चादर ताने, अगल-बगल सुस्ताती गाड़ियों को।
बालकनी में खड़ा वो देख रहा है
आसमान में हलकी बदली है ,
कुछ तारे हैं, छुपता-दीखता चाँद है
महसूस करता है खुद को
आत्मसात करते हुए प्रकृति के संग।
उसे सुनाई दे रही है इस सन्नाटे में
प्रकृति की कोमल आवाज !
जो दिन में कही दब जाती है,
गाड़ियों के पैं-पैं और चिल्लाते इंसानों के चैं-चैं में।

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