शुक्रवार, 11 मार्च 2011

एक नयी सुबह की चाह लिये

एक  नयी  सुबह  की  चाह   लिये  
वो  रात  अँधेरी  गुजर  गया  
वो  चाँद  को  छूने   की  ख्वाहिश  
उस  चाँद  के  सम्मुख  दफ़न  हुयी .

रक्तिम  सा  रूप  सलोना  सा   

वो  दिवस  की  भट्टी  में तपकर
सर्वस्व विजय  की   चाह  लिए  
वो  राह  अनोखे   निकल  गया

पर  दूर  तलक   जाकर  देखा 
तो  रात  अँधेरी     काली  थी
कुछ  देर  खड़ा  वो  मौन  रहा
 
कुछ  झुंझलाया  कुछ  भ्रमित  सा
फिर  ख्वाब  सुबह  का  लीये  हुए
अपने  ही  धुन  में  मतवाला
वो  राह उसी  बढ़ता  ही  गया

एक  नयी  सुबह  की लिए
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